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(विचार मंथन) बाबरी विध्वंस के सवाल जो चुभते हैं सूल से (21एलके01एचओ)

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डॉ.हिदायत अहमद खान
बाबरी विध्वंस का मामला महज ईंट और गारे से बनी इमारत के खंडहर हो चले ढांचे को ढहा देने मात्र से जुड़ा हुआ नहीं है। बल्कि इसे आस्थाओं से जोड़कर देखा जाना उचित होगा। ऐसा कहने और दावा करने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि आस्थाएं कभी इंसान पर चोट नहीं करतीं और न ही इस बात की इजाजत देती हैं कि बेकसूर इंसानों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया जाए। बात साफ है कि धार्मिक आस्थाओं में त्याग है, समर्पण है, किसी को अपना बना लेने की प्रेरणा है। यह प्रेम की वो संकरी गली है जिसमें दो नहीं समा सकते। यह एकाकार होने का मार्ग प्रशस्त करती है, इसलिए जिसमें आस्था होती है वह एकाकी जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हो जाता है और उसके लिए यह संसार और उसका भौतिक सुख काटने को दौड़ता प्रतीत होता है। यदि धर्म और मजहब में आप ऐसी आस्था रखते हैं तो आपको समाज की नहीं बल्कि समाज को आपकी आवश्यकता होती है। यहां तो उल्टा हो रहा है आस्था के नाम पर लोगों को एकत्र कर हिंसा को बढ़ावा दिया जाता है। धर्म को बदनाम करने और उसके नाम पर लोगों को भ्रमित करने का गंदा खेल खूब खेला जा रहा है। यदि ऐसा नहीं था तो फिर एक खंडहर हो चली इमारत को गिराने के लिए आखिर इतना बड़ा आंदोलन करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी और उसे बचाने के नाम पर लोगों को क्योंकर धर्म का वास्ता दिया गया। लोगों को एक-दूसरे का खून पीने और पिलाने का संदेश देते वक्त आखिर धर्म और आस्था कहां चली जाती है? बात साफ है कि इसमें राजनीति बहुत अंदर तक पैठ बना चुकी है। इस मामले को धर्म या आस्था के चश्में से नहीं बल्कि राजनीति और वोटबैंक के चश्में से देखा जा रहा है इसलिए इतनी बड़ी-बड़ी दिक्कतें आ रही हैं। यहां अदालत का फैसला सर्वमान्य होना चाहिए। यह कहने वालों की जुबान नहीं थकती लेकिन जैसे ही किसी एक गुट के पक्ष में फैसला आता है दूसरा गुट अदालत की मान-मर्यादा भूल मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। तब अदालत के प्रति आस्था कहां गुम हो जाती है, समझ से परे है! सवाल बहुत ही सीधा लेकिन चुभने वाला है। सबसे पहले इंसान का धर्म इंसानियत है जिसका पालन करते हुए कम से कम मानव जीवन को बचाने और उसे सही रास्ते पर चलने की शिक्षा देने का काम होना चाहिए। यही वजह है कि अदालत सभी हो सामंजस्य बैठाने और दोनों पक्षों को मिल-बैठकर समस्या का समाधान निकालने की सलाह देती है। इस पर अमल करने में हर्ज क्या है, क्या इस पर भी कोई राजनीति होनी चाहिए? बावजूद इसके वो लोग दूर बहुत दूर नजर आते हैं जिन्हें समस्या का समाधान तलाशना है, इस मामले में वो लोग ज्यादा उछलते दिखाई देते हैं जिनका उससे दूर-दूर तक वास्ता नहीं होता। जहां तक इस प्रकार की हिंसा करने वालों का सवाल है तो उनसे कानूनन सख्ती से निपटा जाना चाहिए। ऐसे कथित धार्मिक आस्थावान लोगों पर वैसे ही कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए जैसे कि किसी हत्या के साजिशकर्ता या आतंक फैलाने वालों के खिलाफ की जाती है। इसमें धर्म आड़े नहीं आना चाहिए और न ही राजनीति होनी चाहिए। सच पूछा जाए तो जो राजनीतिक दल ऐसे मामलों को लेकर सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी या आंदोलन में शरीक पाए जाते हैं, उन्हें राजनीतिक गलियारे से अलग कर देना उचित होगा। दरअसल धर्म और जाति की राजनीति करने के चलते ही समाज में अनेक तरह के बिगाड़ पैदा हो गए हैं। ये तमाम कथित राजनीतिज्ञ समाज को जोड़ने और शांति बहाली करने की बजाय तोड़ने और हिंसा फैलाने का काम कर रहे हैं। इसे संज्ञान में लेने की आवश्यकता है,   ताकि देश सुख-शांति के साथ तरक्की के रास्ते तय कर सके। जहां तक वर्ष 1992 में बाबरी ढांचा ढहाए जाने का मामला है तो उसके बाद जो हिंसा हुई और उसमें जिन लोगों के घर-परिवार तबाह हुए वो काबिले जिक्र बात है। उसे ध्यान में रखते हुए अगला कदम बहुत ही फूंक-फूंक कर रखने का है। दरअसल कानूनी दांवपेंच में बहुत साल गुजर गए  अब जाकर न्यायालय ने भी माना है कि इसे और ज्यादा नहीं खींचा जाना चाहिए। अतŠ अदालत कहती है कि अब सुनवाई होगी और लगातार होगी, जिससे मामले को निपटाया जा सके। इस वजह से भाजपा नेत्री और केंद्रीय मंत्री सुश्री उमा भारती तो यहां तक कहती हैं कि अयोध्या, गंगा और तिरंगे पर उन्हें कोई खेद नहीं है। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कह दिया है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, जोशी, उमा भारती समेत 13 पर आपराधिक साजिश का केस चलेगा। कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रपति चुनाव की नजदीकियों से जोड़कर देखा है और कहा है कि अब आडवाणी राष्ट्रपति भी नहीं बन पाएंगे, क्योंकि वो भी इस मामले में आरोपी हैं। अगर इस प्रकार की कोई राजनीतिक साजिश है तो बहुत ही घिनौनी और असंयमित है। फिर भी मामला अभी अदालत में विचाराधीन है और ऐसे में कानूनन उन्हें राष्ट्रपति चुनाव में उतरने से कोई रोक नहीं सकता। यह अलग बात है कि इसके लिए पार्टी और केंद्र सरकार क्या सोचती है यही आडवाणी के लिए प्रमुख बात होगी। वहीं किसी भी तरह की सजा भुगतने को तैयार सुश्री उमा भारती से भी विपक्ष ने इस्तीफा मांग लिया है, जिस पर यदि संयम नहीं दिखाया गया तो हो सकता है कि मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री का पद जैसे उन्होंने खोया था यहां से मंत्री पद भी जाता रहे। इसमें भावावेश से काम लेना उचित नहीं होगा। क्योंकि इसमें व्यक्तिगत नुक्सान ज्यादा है पार्टी या संगठन को तो कतई इससे कोई नुक्सान होते हुए दिखाई नहीं देता है। कम से कम सुश्री उमा भारती से जुड़े मामलों ने तो यही सबक दिया है, यह अलग बात है कि उससे शिक्षा जिन्हें लेना चाहिए था उन्होंने ली ही नहीं और लगातार विवादों में बने हुए हैं। 
21अप्रैल/05.00/ईएमएस
 
Admin | Apr 21, 2017 15:09 PM IST
 

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